एक माँ ऐसी भी संकल्प के कमरे का दरवाजा खोलते ही वीणा का मन कसैला सा हो गया । कितना बेतरतीब सा कर रखा हैं, धुले कपड़े चादर की गठरी से बाहर निकलकर जैसे चिढ़ा रहे थे – बहुत तहज़ीब पसंद हो ना, अब अपने बेटे को थोड़ा शरूर सिखाओं तो जानें ।’ चादर झटकारने के लिए तकिया उठाया ही था कि देखा, तकिये के नीचे रोमांटिक पत्रिका रखी हुई हैं, पन्ने पलटे तो मन घृणा से भर उठा –ये मेरा ही बेटा है ? घिन आती है इसकी सोच पर मुझे । सोचने को मजबूर हो जाती हॅू कि क्या वाकई बच्चों के गुण-अवगुण, आदतें माता-पिता के जींस पर ही निर्भर करते हैं ? संकल्प के पापा और मैं तो ऐसे नहीं थे, फिर ये हमारा बेटा ऐसा कैसे हो गया ? चादर झटकारकर वीणा से मैग्जीन जस की तस तकिये के नीचे रख दी । कमरा थोड़ा सलीके से करके वह बाहर आई तभी डोरबेल बजी । दरवाजा खोला तो सामने संकल्प कॉलेज का बैग पकड़े खड़ा था । हाय मॉम, कैसी हो, क्या कर रही हो ? मैं तो ठीक हॅू, । चाय बना रही हॅू, पीयेगा मेरे साथ ? मेरे मन की बात कह दी मॉम, , आप चाय बनाओ जल्दी से, बहुत थकान सी लग रही हैं । मैं फ्रेश होकर आता हॅू वीणा...

बहुत सारगर्भित कहानी।
ReplyDeleteआज के युग मे अभिभावको को बच्चो को उनकी इच्छा के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता देना चाहिए।👍
आभार जी
DeleteVery natural and inspiration, also a message
ReplyDeleteआत्मीय आभार
Deleteबहुत ही अच्छी कहानी है , बच्चों की इच्छा और निर्णय का सम्मान करना बहुत ज़रूरी है ...
ReplyDeleteआभार मिष्ठी
DeleteVery nice Anjali.
ReplyDeleteThanx a lot
DeleteBahut hi real & inspiring story hai
ReplyDeleteThanx a lot
DeleteVery inspirational for the new generation.
ReplyDeleteThanx a lot
Deleteबहुत ही सारगर्भित कहानी
ReplyDelete👏👏👏👏👏👏
आत्मीय आभार जी
DeleteBahut he acchi rachna
ReplyDeleteआभार आपका
Deleteआत्मीय आभार जी
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