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"सपनों को मिली नई उड़ान" - अंजली खेर द्वारा लिखित

 



सपनों को मिली नई उड़ान

मोबाइल की घंटी ने मनस्‍वी की सपनीली इंद्रधनुषी दुनिया की तंद्रा को भंग कर दिया । मोबाइल पर ‘तरूण सर’’ का नाम दिखते ही उसकी सारी नींद भाग गई ।  आनन-फानन में उसने मोबाइल उठाया ।

’’गुड मॉर्निंग सर’’

वेरी गुड मार्निंग, मनस्‍वी,,,, कॉन्‍ग्रेचुलेशन्‍सससस ।  अभी हाल उस कंपनी के इंटरव्‍यू का रिजल्‍ट डिक्‍लेयर हुआ हैं, उसमें तुम्‍हारा सिलेक्‍शन हो गया हैं । मनस्‍वी तुमने तो कॉलेज का नाम रोशन कर दिया । इतनी बड़ी कंपनी में सिलेक्‍शन होना हमारे कॉलेज के लिए भी गर्व की बात हैं ।

थैक्‍स ए लॉट सर, आपने तो मेरा दिन बना दिया ।  मेरी इस सफलता में आपका बहुत सहयोग रहा । आपने इंटरव्‍यू की तैयारी में मेरी बहुत मदद की, इस बात को मैं कभी नहीं भूल सकती । 

अरे कैसी बातें करती हो? मैने तो अपनी ड्यूटी की,  मेहनत तो तुम्‍हारी थी पूरी । चलो अंत भला तो सब भला, एन्‍जॉय करों । 

ओ के थैक्‍स अगेन सर,,,, कहकर मनस्‍वी ने फोन कट किया तो उसकी आंखों से खुशी के आंसु झर-झर बह निकले ।

मुँह धोकर किचन जाकर मनस्वी एक कप गरमागरम चाय लेकर आई । उसकी आंखों के आगे दो साल पहले की घटनाएं चलचित्र की भांति घूमने लगी थी ।

नहीं, मनस्‍वी बाहर पढ़ने नहीं जाएगी,,, माहौल देखा हैं आज का तुमने,,, अरे हमारी बेटी पर हमें भरोसा हैं, पर दुनिया के रंग ढंग देख रही हो ना खुद अपनी आंखों से – पापा कितनी कठोरता से सब एक ही सांस में कह गए थे।

कैसे पिता हो आप?  मनस्‍वी ने अपने बलबूते कैट के एक्‍जॉम में इतने अच्‍छे नंबर लाये, इतनी अच्‍छी रेंकिंग वाला बेंगलोर  का कॉलेज मिल रहा हैं उसे ।  जाने दीजिए उसे, उसके कैरियर का सवाल हैं – मम्‍मा पापा से मिन्‍नतें कर रही थी ।

नहीं, मैने कह दिया सो कह दिया, यदि भोपाल के ही कॉलेज में उसका एडमिशन नहीं होता तो थोड़ा सोचा भी जा सकता था, उसमें भी तो हमारी बेटी मेरिट में आई हैं, फिर घर छोड़ कर बाहर पढ़ने भेजने का प्रश्‍न ही नहीं उठता – पापा ने यूं कहा जैसे उनका कहा पत्‍थर की लकीर हो ।

पापा के आगे मम्‍मा की कहा चलते वाली थी ,,,,, थोड़ी जोर जबरदस्‍ती करने के बाद भी बात नहीं बनी तो मम्‍मा ने मानों हथियार डाल दिये थे । 

मनस्‍वी के अंतस में अंतद्वंद सा छिड़ गया था । पापा की सुनुं या अपने मन की?

पापा शायद भूल रहे थे कि मनस्‍वी ने उनके कहने पर ही साइबर क्राइम डिपार्टमेंट के लिए फॉर्म सबमिट किया था, जबकि उसे कंप्‍यूटर के क्षेत्र में जरा भी दिलचस्‍पी नहीं थी । पापा के मन में न जानें क्‍यों ये बात घर कर गई थी कि मनस्‍वी पढ़ाई नहीं करती, टाइमपास करती हैं जबकि ऐसा नहीं था । हां वो घंटों एक जगह बैठ पढ़ाई नहीं करती थी, पर जितना भी पढ़ती वो उसका 100 प्रतिशत देती थी, तभी तो कैट के ऑल‍ इंडिया लेवल के एक्‍जॉम में उसके 92 परसेंटाइल आये थे ।

खुद आई टी वाले थे, सो सोचते थे कि उनकी बेटी भी उसी फील्‍ड़ में जाये ।। कोई जरूरी तो नहीं कि सबकी रूचि एक सी हो । फिर  मनस्‍वी का तो स्‍वभाव ही ऐसा नहीं था कि ऑफिस में एक सीट पर 8-10 घंटे बैठकर रोज रोज एक -सा काम करें । उसे तो रोज़ नये नये लोगों से मिलना, बातें करना पसंद था । वो कहती कि कोई चेलेंज न हो तो काम करने का क्या मज़ा ? और इसी कारण वो अपनी मनपसंद स्ट्रीम यानि मार्केटिंग में जाना चाहती थी । 

मनस्‍वी की मम्‍मा अपनी बेटी के मन की दुविधा को बखूबी जानती थी । कल तक घर को चहक-चहक का गुलज़ार करने वाले बेटी अचानक से शांत, खोई-खोई सी  रहने लगी थी । कई बार देर रात चहलकदमी करती मनस्‍वी की बेचैनी ने मां के दिल में खलबली सी मचा दी थी ।

एक दिन शाम में मां ने मनस्‍वी को उन्‍हें  लांग ड्राइव पर ले जाने को कहा । फिर रास्‍ते में दोनों इधर उधर की बातें करते रहे । जब कार शौर्य स्‍मारक के सामने से गुज़री तो मां ने मनस्‍वी को कार रोकने को कहा । 

दोनों शौर्य स्मारक के गार्डन पहुंचकर  हरी-भरी घास पर बैठ गयीं  । मनस्वी के मन तो टटोलने के लिए  मां ने मनस्‍वी का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा – मनस्वी, ‘’एक बात पूंछूं ? वादा करों, अपने दिल की एकदम सच्‍ची बात कहोगी ।‘’

हां, मां, पूछो ना,,,

ये बता कि तुम्‍हारा दिल कहा ज्‍वाइन करने का हैं, भोपाल में या बेंगलोर में?

मां, सच्‍ची बात कहूं तो मैं बेंगलोर जाना चाहती हूं, वहां मुझे मेरी मनपसंद स्‍ट्रीम मिली हैं, ऐसा नहीं हैं कि मैं घर में रहना नहीं चाहती, पर मां मैं कैसे उस फील्‍ड को चुनुं जब मुझे आई टी ज़रा भी  इन्‍ट्रेस्‍ट नहीं । 

यानि तुम्‍हारा मन बेंगलोर जाकर मार्केटिंग में एम बी ए करने कर ही हैं, हैं ना?

हां मा, पर पापा को कैसे समझाएं, वो तो समझते हैं कि मैं भोपाल में रहना ही नहीं चाहती, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं,,,फिर 12th में इतना अच्छा रिजल्ट आने के बाद भी केट की तैयारी के लिए ही तो भोपाल में भी ग्रेजुएशन किया न मम्मा मैने,,, 

ठीक हैं, मैं बात करूंगी पापा से इस बारे में । बस तुम एक बात ध्‍यान रखना कि अपने लक्ष्‍य को ध्‍यान में रखना । ऐसा कोई काम ना करना जिससे मां-पापा का सिर नीचे झुके ।

मां,  आप मुझ पर विश्वास रखो  । पर आप पापा से बात करोगी,?,,, नहीं नहीं, घर में महाभारत छिड़ जाएगा ।

तो क्‍या तुम कॉम्‍प्रोमाइज करोगी,?,, नहीं मैने अपने कैरियर को दांव पर लगा दिया, उतना ही बहुत हैं । अब मेरा चुप बैठना यानि मेरा पढ़ा-लिखा होना न होना बराबर होगा ,,,,बस  अब मैं चुप नहीं रहूंगी । चल उठ घर चलें, बेंगलोर जाने की तैयारी करनी हैं ना,,,

घर पहुंचकर जैसे ही मां ने पापा से कहा –‘’मनस्‍वी बेंगलोर जाएगी और वहीं से एम बी ए करेगी,,,

क्‍यों, भोपाल में रहकर पढ़ने से उसे नौकरी नहीं मिलेगी क्‍या?

देखिए मनस्‍वी का सपना था बडे कॉलेज से मार्केटिंग में एम बी ए करने का, और जब उसे आई टी में इंन्‍ट्रेस्‍ट ही नहीं तो फिर क्‍यों हम उसे जबरदस्‍ती करें,? ,, उसके कैरियर का सवाल हैं, निर्णय भी वही लेगी,,,,

उसके साथ तुम्हारा भी दिमाग खराब हो गया हैं क्‍या ?,,, इतनी दूर भेजकर कल को कुछ कम ज्‍यादा हो तो कौन जिम्‍मेदार होगा?

मैं जिम्‍मेदारी लेती हूं अपनी बेटी की,, मनस्‍वी वहीं करेगी जो उसका मन करता हैं, और देखिएगा मुझे विश्‍वास हैं वो एक दिन हमारा नाम रोशन करेगी ,,,

माँ,, मेरी मम्मा,, आज मैं जो कुछ भी हूं, उसका श्रेय आपको ही जाता है । ये खबर सुनकर माँ फूली नही समायेगी,,, माँ को फोन लगाने का विचार करते हुये मनस्वी ने मोबाइल उठाया ही था कि मोबाइल पर घंटी बजने लगी  ,,, 

मनस्वी, बधाई हो,, अभी हाल व्हाट्सएप ग्रुप पर तुम्हारा रिजल्ट पता पड़ा । मेरी जान,,, मैं आ रही  हुं तुम्हारे होस्टल । । 

थैंक्स रिया - कहकर वो  पहले मम्मा को फोन पर खुशखबरी सुनाती है और फिर कॉलेज के लिए तैयार होती है ।
लेखक: अंजली खेर
संपर्क करें9425810540
प्रकाशक: अनफोल्ड क्राफ्ट 

Comments

  1. बहुत सारगर्भित कहानी।
    आज के युग मे अभिभावको को बच्चो को उनकी इच्छा के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता देना चाहिए।👍

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  2. Very natural and inspiration, also a message

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  3. बहुत ही अच्छी कहानी है , बच्चों की इच्छा और निर्णय का सम्मान करना बहुत ज़रूरी है ...

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  4. Bahut hi real & inspiring story hai

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  5. Very inspirational for the new generation.

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  6. बहुत ही सारगर्भित कहानी
    👏👏👏👏👏👏

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